|
|
|
|
| Saturday 11 October, 2008 |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
|
apni marjhi ke
अपनी मरzई से कहाँ अपने सफर के हम हैं रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है अपने ही घर में किसी दुउसरे घर के हम हैं
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों तक किसको मालुउम कहाँ के हैं किधर के हम हैं
चलते रहते हैं की चलना है मुसाफिर का नसीब सोचते रहते हैं की किस राहगुज़र के हम हैं
निदा फ़ाज़ली
|
|
| | |
|
|
|
|
|
|
|