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sochate sochate
दर्द दिल में उठा सोचते सोचते या क्या आ गया सोचते सोचते
कौन था क्या था वो याद आता नहीं याद आ जायेगा सोचते सोचते
राह में रह गई आने वाली सहर बुझ गया हर दिया सोचते सोचते
अजनबी लोग हैं अजनबी रास्ते मैं कहाँ आ गया सोचते सोचते
दूर हो कर न हम-तुम क़रीब आ सके बढ़ गया फ़ासला सोचते सोचते
जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है यादों के दरीचे में चिलमन सी सरकती है
यूँ प्यार नहीं छुपता पलकों के झुकाने से आँखों के लिफ़ाफ़ों में तहरीर चमकती है
ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आये बिछड़े हुये मिलते हैं जब बर्क पिघलती है
शोहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
कहीं तारे कहीं शबनम कहीं जुगनू निकले सारे मंज़र तेरी आवाज़ के जादू निकले
ज़िंदगी हम जिये औरों की ख़ुशी की ख़ातिर भीड़ में हँस दिये तन्हाई में आँसू निकले
तेरे होंठों पे चमक उट्ठे मेरा नाम कभी और मेरी ग़ज़लों के परदों से कभी तू निकले
जब भी याद आ गया वो साँवला चेहरा 'राशिद' आँखों में फूल खिले साँसों से ख़ुश्बू निकले
mumtaz rashid
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