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| Saturday 11 October, 2008 |
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kabhi kabhi
कभी यूँ भी तो हो दरिया क़ा साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो और तुम आओ कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफिल हो, कोई तुम्हारी बात हो और तुम आओ कभी यूँ भी तो हो
कभी यूँ भी तो हो ये नरम मुलायम ठंडी हवाएं जब घर से तुम्हारे गुज़रें, तुम्हारी खुशबू चुराएं मेरे घर ले आएँ कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर महफिल हो, कोई ना मेरे साथ हो और तुम आओ कभी यूँ भी तो हो
कभी यूँ भी तो हो ये बादल ऐसा टूट के बरसे मेरे दिल की तरह मिलने को, तुम्हारा दिल भी तरसे तुम निकलो घर से कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो दिल हो, बूण्दे होण बरसात हो और तुम आओ कभी यूँ भी तो हो दरिया कॅया साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो और तुम आओ कभी यूँ भी तो हो जावेद अख्तर
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