रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिये आ
आ फीर से मुजे़ छोड़ के जाने के लिये आ
पहेले से मरा़सिम न सही फीर भी कभी तो
रस्म-ओ-राहे दुनीया ही निभाने के लिये आ
किस-किस को बतायेंगे जुदाई का सबब हम
तु मुज़से ख़फा है तो ज़माने के लिये आ
कुछ़ तो मेरे पींदार-ए-मुहोब्बत का भरम रख़
तु भी तो कभी मुज़को मनाने के लिये आ
इक उम्र से हुं लज्ज़त-ए-गीरीया से भी मेहेरु़म
ए राहत-ए-जां मुज़ को रुलाने के लिये आ
अब तक दिल-ए-खु़श फ़हम को है तुज़से उम्मीदें..
ये आखीरी शम्में भी बुज़ाने के लिये आ
ahemed faraz